50 बेहद मशहूर ग़ज़ल

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मुद्वत से मेरा दिल है कि आबाद नही है,
होटों पे मगर आज भी फरियाद नही है ।
आता है ख्यालों में मेरे एक ही चेहरा,
बस इसके सिवा कुछ भी मुझे याद नही है ।
फिरतें हैं सभी लोग यहाॅं सहमे हुए से,
इस शहर में जैसे कोई आजाद नही है ।
देखा है उजडते हुए कितने ही घरों को,
है कौन जो इस इश्क में बरबाद नही है ।
इक लहर सी उठती है आज भी दिल में,
इस लहर के उठने का सबब याद नही है ।

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एक उम्र हो गई तन्हा चलते हुए
यॅंू कतरे लहू के निगलते हूए ।
चलता हूँ  यादों के पेड के पत्ते,
पैरों तले अपने कुचलते हुए ।
सहर की आरजू करता है दिल,
अक्सर शामों को टहलते हुए ।
बेरगं हो चला हर तिनका तिनका,
जिंदगी की रगों में ढलते हुए ।
शायद एक अरसा गुजर भी गया,
खुशी की चाह में मचलते हुए ।
दर्द से रिश्ता निभा रहा हॅंू,
पल पल इस तपिश में जलते हुए ।
बेमानी इस दौड में थम जाऊॅं बस,
रोता है दिल भी दहलते हुए ।
मजिंल ही तेरी तुझसे खफा है ‘सचिन‘
क्या चलना अब रास्ते बदलते हुए ।

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हर लहजा तेरे पांव की आहट सुनाई दे
तू लाख सामने न हो, फिर भी दिखाई दे ।

आ इस हयाते दर्द को मिल कर गुजार दें
या इस तरह बिछड कि जमाना दुहाई दे ।

तेरा ख्याल ही मुझे आया न हो कहीं
इक रोषनी-सी आंख से दिल तक दिखाई दे ।

मिलने की तुझसे फिर न तमन्ना करे ये दिल
इतने खुलूस से मुझे दा़गे जुदाई दे ।

देखें तो कैस लौ भी दिये की लगे है सदी
सोचें तो गुल की शाख भी जलती दिखाई दे ।

सईद कैस

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हमको उनसे वफ़ा की है उम्मीद
जो नही जानते वफ़ा क्या है

हम है मुश्ताक़ और वह भेज़ार
या इलाही ! ये माजरा क्या है

जब की तुझ बिन नहीं कोई मौजूद
फिर ये हंगामा, ए खुदा! क्या है

जान तुम पर निसार करता हूँ
मैं नही जानता दुआ क्या है

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उनके देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक
वो समझते हैं बीमार का हाल अच्छा है

देखिये पाते हैं पोशाक बुतों से क्या फैज़
इक ब्राह्मण ने कहा है के ये साल अच्छा है

हमको मालूम है जन्नत की हकीकत लेकिन
दिल के खुश रखने को ‘ग़ालिब’ ये ख्याल अच्छा है

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